शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

प्यार ! प्यार ! प्यार !__क्या है यह प्यार ?


प्यार को ईश्वर प्रदान करता है.
प्यार ईमानदारी के गर्भ में होता है.
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चेतना से प्यार किया जा सकता है.
प्यार की सीमा नहीं होती, बल्कि मर्यादा होती है.
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पहले घोड़े के ऊपर बैठना सीखो, उसके बाद दौड़ना प्रारम्भ करो.

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प्यार अपनत्व और अथाह विशवास से होता है.
मुझ से करो प्यार. प्यार का वास्तविक अर्थ समझ जाओगे.
प्यार के वास्तविक स्वरूप को व्यवहार से समझा जा सकता है.
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प्रेम और सहिष्णुता भारतीय संस्कृति का विशेष व्यवहार है.


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